किशोर न्याय अधिनियम के 10 साल: हरिद्वार में राज्य स्तरीय परामर्श का आयोजन, बाल संरक्षण पर मंथन
ब्यूरो
Posted no : 20/09/2026
हरिद्वार।
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के एक दशक की समीक्षा और भावी दिशा तय करने के उद्देश्य से रविवार को बहादराबाद स्थिति हयात प्लेस में राज्य स्तरीय हितधारक परामर्श का आयोजन किया गया। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय की किशोर न्याय समिति और महिला सशक्तिकरण एवं बाल विकास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का मार्गदर्शन मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने किया।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता ने कहा कि प्रभावी क्रियान्वयन के बिना कोई भी उत्कृष्ट कानून केवल एक अधूरा वादा बनकर रह जाता है। नोबेल पुरस्कार विजेता गैब्रिएला मिस्ट्राल के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे का विकास स्थगित नहीं किया जा सकता। उन्होंने सभी हितधारकों से इस अधिनियम के उद्देश्यों को धरातल पर उतारने के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की अपील की।
कार्यक्रम में किशोर न्याय समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने कहा कि विधि के साथ संघर्षरत या देखरेख की आवश्यकता वाला बालक सबसे पहले एक बच्चा है, जो दण्ड नहीं बल्कि पुनर्वास और समाज में एकीकरण का अधिकारी है। न्यायमूर्ति आलोक महरा ने समयबद्ध न्याय प्रणाली पर जोर देते हुए कहा कि न्याय में विलम्ब बच्चे के भविष्य को प्रभावित करता है, वहीं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों तक बाल संरक्षण पहुँच सुनिश्चित करने की बात कही।
दिनभर चले इस परामर्श में पाँच तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें दत्तक ग्रहण, प्रारंभिक मूल्यांकन और बाल संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विशेषज्ञों तथा अधिकारियों ने विस्तृत विचार-विमर्श किया।सत्रों में निदेशक उजाला प्रदीप पंत, सचिव महिला कल्याण चंद्रेश यादव, कारा की CEO भावना सक्सेना, आईजी कुमाऊं निवेदिता कुकरेती सहित विभिन्न क्षेत्र के विशेषज्ञों ने अपने सुझाव प्रस्तुत किए।
इस कार्यक्रम में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग, विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों और न्यायाधीशों सहित 180 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में बालिकाओं द्वारा सरस्वती वंदना प्रस्तुत की गई। समारोह का समापन रजिस्ट्रार जनरल योगेश कुमार गुप्ता के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ, जिसमें जिला प्रशासन और जिला न्यायालय हरिद्वार की सक्रिय भूमिका रही।
