हरिद्वार।
पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य विद्या महासम्मेलन (AIOC) के दूसरे दिन देशभर के संतों, शंकराचार्यों और धर्माचार्यों ने सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता के संरक्षण के लिए ‘सनातन शास्त्र शुद्धि समिति’ के गठन पर सर्वसम्मति जताई। समिति के अंतर्गत विद्वत परिषद और संत-संन्यासी परिषद का भी गठन किया गया है। विद्वत परिषद शास्त्रों में कथित प्रक्षेपण और विकृतियों का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार करेगी, जबकि संतों का मार्गदर्शक मंडल उस पर विचार करेगा।
योग गुरु स्वामी रामदेव ने भावुक होते हुए कहा कि उन्हें इस अभियान का कोई श्रेय नहीं चाहिए, उनका एकमात्र संकल्प सनातन का गौरव लौटाना है। उन्होंने कहा कि वेद, श्रुति और ऋषि परंपरा अपने शुद्धतम स्वरूप में सामने आनी चाहिए। सनातन धर्म की वैज्ञानिकता का प्रचार संपूर्ण विश्व के कल्याण के लिए होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग मिलावटी संदर्भों और एआई टूल्स के माध्यम से देवी-देवताओं और अवतारी महापुरुषों के बारे में भ्रामक बातें प्रसारित कर रहे हैं।
आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि संतों द्वारा शुरू किए गए इस अभियान को पूरी शक्ति, प्रामाणिकता और योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने बताया कि षड्यंत्रपूर्वक विकृत किए गए भारतीय इतिहास का सनातन दृष्टिकोण से पुनर्लेखन करने का कार्य भी पतंजलि योगपीठ में चल रहा है।
कार्ष्णि पीठाधीश्वर स्वामी गुरु शरणानंद ने समिति में शुद्ध आचरण वाले विद्वानों को शामिल करने पर जोर दिया। वहीं स्वामी राजेंद्र दास ने शास्त्रों में प्रक्षेपों के विषय पर संतों से एकजुट होकर कार्य करने का आह्वान किया। ऑनलाइन संबोधन में स्वामी अवधेशानंद गिरि ने भी अभियान का समर्थन किया।
संत-संन्यासी परिषद के संयोजक स्वामी परमात्मानंद और विद्वत परिषद के संयोजक केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी बनाए गए। इस मौके पर रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा लिखित पुस्तक ‘वैदिक आख्यान विज्ञान’ का विमोचन भी किया गया।
सम्मेलन में ज्योतिष पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी गोविंददेव गिरि, स्वामी ज्ञानानंद, स्वामी चिदानंद सरस्वती, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, स्वामी हरि चेतनानंद, विहिप अध्यक्ष आलोक कुमार, आरएसएस के अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल, साध्वी ऋतंभरा, माता अमृतानंदमयी, स्वामी अच्युतानंद तीर्थ, स्वामी निर्मलानंद गिरि, स्वामी विश्वप्रसन्न तीर्थ, स्वामी सुगुणेंद्र तीर्थ, स्वामी निश्चलानंद सरस्वती के प्रतिनिधि सहित देशभर के विभिन्न मठों, अखाड़ों और गुरु परंपराओं के संत-महात्मा शामिल हुए। सम्मेलन में 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति और करीब 40 विद्वानों ने भी शास्त्र विमर्श में भाग लिया।
