धूम्रपान की लत छुड़ाएगी आयुर्वेदिक ‘धूम्र दंडिका’ ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज का अनूठा प्रयोग, CTRI में भी पंजीकृत
ब्यूरो
Posted no : 29/07/2026
हरिद्वार।
धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए जानलेवा है—यह चेतावनी हर तंबाकू उत्पाद पर लिखी होती है, लेकिन लत से जूझ रहे लोगों के लिए इसे अचानक छोड़ पाना बेहद मुश्किल होता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और आयुर्वेदाचार्यों ने एक अनोखा और कारगर समाधान खोज निकाला है।
हरिद्वार स्थित प्रसिद्ध ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज के अगदतंत्र विभाग ने एक खास औषधीय धूम्रपान दंडिका यानी ‘हर्बल बीड़ी’ तैयार की है। यह बीड़ी पूरी तरह से निकोटीन और तंबाकू मुक्त है, जो फेफड़ों को नुकसान पहुँचाए बिना लोगों को धूम्रपान की गंभीर लत से आजादी दिलाने में मददगार साबित हो रही है।
आयुर्वेद की प्राचीन विधा और आधुनिक अनुसंधान के इस संगम से तैयार की गई यह हर्बल बीड़ी पारंपरिक तंबाकू की तरह ही धुआं निकालती है। विशेषज्ञों के अनुसार, धूम्रपान करने वालों में निकोटीन के अलावा धुएं के साथ एक मनोवैज्ञानिक जुड़ाव (Psychological Craving) भी हो जाता है। यह हर्बल बीड़ी मरीज की उसी मनोवैज्ञानिक तलब को पूरा करती है, लेकिन इसमें हानिकारक तंबाकू की जगह शरीर को फायदा पहुँचाने वाली आयुर्वेदिक औषधियों का इस्तेमाल किया गया है। इससे व्यक्ति को बिना किसी दुष्प्रभाव के लत छोड़ने में आसानी होती है।
अगदतंत्र विभाग, ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भावना मित्तल का कहना है कि “धूम्रपान छोड़ने के दौरान मरीजों को शारीरिक से ज्यादा मनोवैज्ञानिक तलब महसूस होती है। हमारी इस औषधीय धूम्रपान दंडिका की खासियत यह है कि ये बिना निकोटीन और तंबाकू के धुआं देती है, जिससे मरीज का साइकोलॉजिकल सैटिस्फैक्शन पूरा होता है। इसमें शामिल आयुर्वेदिक औषधियाँ फेफड़ों को नुकसान पहुँचाए बिना शरीर को लाभ देती हैं।”
सीटीआरआई में पंजीकृत है औषधि
इस आयुर्वेदिक पहल की वैज्ञानिक प्रामाणिकता और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए इसे ‘सेंट्रल क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया’ (CTRI) में बाकायदा पंजीकृत कराया गया है। पिछले एक महीने से ऋषिकुल आयुर्वेद कॉलेज की ओपीडी (OPD) में डॉक्टरों की सीधी देखरेख में धूम्रपान छोड़ने के इच्छुक मरीजों पर इसका ट्रायल किया जा रहा है। शुरुआती नतीजों से चिकित्सक और मरीज दोनों ही बेहद उत्साहित हैं। ओपीडी में आ रहे मरीजों का कहना है कि इसके नियमित सेवन से उनकी तंबाकू वाली बीड़ी-सिगरेट पीने की आदत धीरे-धीरे कम हो रही है।
नशे जैसी गंभीर सामाजिक बुराई से समाज को मुक्त कराने के लिए ऋषिकुल के आयुर्वेदाचार्यों ने प्राचीन ग्रंथों के नुस्खों को आधुनिक शोध के साथ पिरोया है। हरिद्वार से शुरू हुआ यह प्रयोग नशामुक्ति के क्षेत्र में एक बड़ा और क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। इस नए प्रयोग में आयुर्वेद कॉलेज के अगद तंत्र विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ रमेश चंद्र तिवारी, सहायक प्रोफेसर वेद भूषण शर्मा भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
इस शोध प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहीं पीजी की छात्रा और शोधार्थी, डॉ. प्रगति नेगी के मुताबिक, “आयुर्वेदिक ग्रंथों में वर्णित सिद्धांतों के आधार पर इस हर्बल दंडिका का निर्माण किया गया है। इसकी वैज्ञानिक प्रामाणिकता के लिए इसे सेंट्रल क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया (CTRI) में पंजीकृत कराया है। ऋषिकुल की ओपीडी में आ रहे मरीजों पर इसके ट्रायल के शुरुआती परिणाम बेहद सकारात्मक और उत्साहजनक हैं।”
